संदेश

कवच नारायण

रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलांछन श्रीहरि,उषाकाल में खड़गधारी भगवान जनार्दन,सूर्योदयसे पूर्व श्रीदामोदर और संपूर्ण संध्याओंमें कॉलमूर्ति भगवान विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें। चक्रम युगांतनल 

Index,विशाखा,16

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- दुर्वासाजीकी दुःखनिवृत्ति   ६- इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषिकी कथा  ७- राजा त्रिशंकु और हरिश्चन्द्रकी कथा  ८-सगर-चरित्र  ९-भगीरथ-चरित्र और गंगावतरण  १०- भगवान् श्रीरामकी लीलाओंका वर्णन  ११-भगवान् श्रीरामकी शेष लीलाओंका वर्णन  १२-इक्ष्वाकुवंशके शेष राजाओंका वर्णन  १३-राजा निमिके वंशका वर्णन

16, नित्यमुक्त

 भगवान परम दयालु हैं। नित्यमुक्त आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई भगवानका अपना है और न तो पराया। वास्तव में तो भगवानके स्वरुपमें मन और वाणी की गति ही नहीं है। भगवानमें कार्यकारणरूप प्रपंच का अभाव होने से बाह्य दृष्टि से भगवान शून्यकेसमान ही जान पड़ते हैं; परंतु उसदृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारणभगवान परमसत्य है। भगवान मायातीत हैं,फिर भी.. भगवान जब अपने ईक्षणमात्रसे(सृष्टि-संकल्पमात्रसे) मायाके साथ क्रीड़ा करते हैं तब भगवानका संकेत पाते ही  जीवोके सूक्ष्मशरीर और  जीवोंके सुप्तकर्म-संस्कार जगजाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है।